शहडोल:नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2026 को लेकर ‘अटल निलय’ जिला भाजपा कार्यालय में प्रेस वार्ता संपन्न

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2026 को लेकर ‘अटल निलय’ जिला भाजपा कार्यालय में प्रेस वार्ता संपन्न

शहडोल। नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर शहडोल नगर के कमला नगर स्थित ‘अटल निलय’ जिला भाजपा कार्यालय में पत्रकार वार्ता संपन्न भाजपा जिला मीडिया प्रभारी विनय केवट ने जानकारी देते हुए बताया कि भाजपा केंद्रीय एवं प्रदेश नेतृत्व के आवाहन पर सोमवार को भाजपा कार्यालय में पत्रकार वार्ता का आयोजन किया गया पत्रकार वार्ता में मुख्य वक्ता के रूप में भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष जयसिंहनगर विधायक श्रीमती मनीषा सिंह जी महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष श्रीमती शालिनी सरावगी उपस्थित रहीं पत्रकार वार्ता का सफल संचालन भाजपा जिला मीडिया प्रभारी विनय केवट ने किया एवं उपस्थिति पत्रकारों का आभार महिला मोर्चा की जिला अध्यक्ष निभा गुप्ता द्वारा किया गया इस दौरान नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष विधायक श्रीमती मनीषा सिंह जी ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए बताया कि कभी-कभी किसी निर्णय में देश का भाग्य बदलने की क्षमता होती है। हम ऐसे ही निर्णय के साक्षी बन रहे हैं। जिस बात का देश को पिछले कई दशकों से इंतजार था, वो सपना अब साकार हुआ है। ये पूरे देश के लिए बहुत ही खास समय तो है ही, साथ ही यह मातृशक्ति के लिए भी अविस्मरणीय क्षण है।

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ केवल एक कानून नहीं, बल्कि सदियों से प्रतीक्षित उस सामाजिक न्याय की प्रतिज्ञा है जिसे आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने धरातल पर उतारा है। यह विधेयक महिलाओं को केवल 'वोट बैंक' समझने वाली मानसिकता को ध्वस्त कर उन्हें नीति-निर्धारण और नेतृत्वकारी भूमिका में बैठाने का ऐतिहासिक काम करेगा।

‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ स्वतंत्र भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है जो हमारी माताओं-बहनों को 'याचक' से 'नायक' की भूमिका में स्थापित करेगा। 

सालों से संसद की दहलीज पर खड़ी भारत की बेटियों का इंतजार अब खत्म हुआ है, क्योंकि यह अधिनियम उन्हें वह राजनीतिक सामर्थ्य दे रहा है जहां वे स्वयं अपने और देश के भविष्य का फैसला करेंगी।

नए संसद भवन के उद्घाटन के बाद आयोजित पहले सत्र की शुरुआत ही एतिहासिक ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम' से हुई थी यानी लोकतंत्र के नए मंदिर का पहला ऐतिहासिक कदम ही भारत की मातृशक्ति को समर्पित रहा। यह इस बात का उद्घोष है कि 'नया भारत' अब अपनी बेटियों के नेतृत्व में आगे बढ़ेगा।

यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उस 'गारंटी' का प्रमाण है, जिसने दशकों से राजनीति के हाशिये पर खड़ी भारत की बेटियों को लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का संवैधानिक अधिकार देकर उन्हें राष्ट्र का भाग्यविधाता बना दिया है।   

सरकार 2023 के मूल कानून में संशोधन कर रही है ताकि अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले पूर्ण परिसीमन चक्र के इंतजार की शर्त को हटाया जा सके। हमारा लक्ष्य है कि 2029 में जब देश नई सरकार चुनेगा, तब संसद के गलियारों में 33 प्रतिशत सीटों पर नारी शक्ति की गूँज सुनाई देगी। 

हमारी चुनी हुई महिला प्रतिनिधि निसंदेह ही संसदीय बहसों की गुणवत्ता बढ़ाएंगी, कानून और नीति निर्माण को प्रभावित करेंगी और सभी भारतीयों की बेहतरी के लिए शासन में सकारात्मक योगदान देंगी।

हमारे लिए यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि महिलाओं को सशक्त बनाने का मतलब एक राष्ट्र को सशक्त बनाना है। जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, तो समाज समृद्ध होता है। 

नारी शक्ति वंदन अधिनियम नए भारत की नई लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता का उद्घोष है। यह बहुत बड़ा और मजबूत कदम है। ये अमृतकाल में सबका प्रयास से विकसित भारत के निर्माण की तरफ बड़ा कदम है। 

पत्रकारों को संबोधित करते हुए प्रदेश उपाध्यक्ष विधायक श्रीमती मनीषा सिंह जी ने कहा कि महिला विरोधी कांग्रेस ने दशकों तक महिला आरक्षण के नाम पर देश की आंखों में धूल झोंकी है। उनके लिए यह विधेयक केवल चुनावों के घोषणापत्र का पन्ना मात्र था जिसे उन्होंने कभी नीयत के साथ लागू नहीं किया।   

आज कांग्रेस को जवाब देना होगा कि जिस देश ने उन्हें दशकों तक पूर्ण बहुमत और निर्बाध सत्ता सौंपी, संसद में उस देश की महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाए?

महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली कांग्रेस का इतिहास ही यह रहा है कि उन्होंने हमेशा आधी आबादी के अधिकारों को अपने राजनीतिक स्वार्थ और सहयोगियों के दबाव की वेदी पर चढ़ाया है। 

महिला आरक्षण विधेयक पहली बार 1996 में एच.डी. देवेगौड़ा सरकार के दौरान प्रस्तुत किया गया था। इसे संसदीय समिति के पास भेजा गया। रिपोर्ट आई और सरकार गिर गई। विधेयक लैप्स हो गया। यही वह पैटर्न था, जिसे कांग्रेस ने अगले अठारह वर्षों में और परिष्कृत किया। 

कांग्रेस ने 1996 से 2014 के बीच केवल राजनीति की। 2010 में राज्यसभा में बिल पास होने के बावजूद, सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने इसे अगले चार साल तक लोकसभा में पेश तक नहीं किया, क्योंकि उनके लिए महिलाओं का हक नहीं, बल्कि अपनी कुर्सी और गठबंधन की मजबूरियां अधिक महत्वपूर्ण थीं। 

वर्ष 1998 में, तत्कालीन कांग्रेस गठबंधन के प्रमुख सहयोगी राजद (RJD) सांसद सुरेंद्र प्रकाश यादव ने संसद में महिला आरक्षण विधेयक की प्रति छीनकर फाड़ दी थी। यह संसदीय गरिमा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का खुला अपमान था। 

कांग्रेस के लिए महिला सशक्तिकरण का मतलब केवल अपने खानदान की विरासत को आगे बढ़ाना था। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के माध्यम से भारत की उस सामान्य पृष्ठभूमि वाली बेटी के लिए संसद के द्वार खोले, जिसके पास कोई राजनीतिक विरासत नहीं है।  

विपक्ष की यह घबराहट दिखाती है कि वे कभी नहीं चाहते थे कि यह बिल पास हो । उनके लिए यह बिल केवल एक मुद्दा था, जिसे वे कभी सुलझाना नहीं चाहते थे। कांग्रेस के शब्द 'इवेंट' के लिए थे, जबकि मोदी जी के शब्द 'इम्प्लीमेंटेशन' के लिए हैं।


*मोदी सरकार में महिला सशक्तिकरण*


विगत 12 वर्षों में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, भारत 'महिला-नेतृत्व आधारित विकास मॉडल' की ओर अग्रसर हुआ है।    

जिस देश में महिलाएं बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती थीं, वहां मोदी सरकार ने 12 करोड़ से अधिक 'इज्जत घर' (शौचालय) बनाकर उनकी गरिमा की रक्षा की। उज्ज्वला योजना के जरिए 10.33 करोड़ महिलाओं को धुएं से मुक्ति मिली और 73% पीएम आवास सीधे महिलाओं के नाम पर रजिस्टर्ड किए गए, जिससे उन्हें संपत्ति का मालिकाना हक मिला।

प्रधानमंत्री मोदी ने महिलाओं को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से जोड़ा है। आज 56 करोड़ जनधन खातों में से 56% खाते हमारी मातृशक्ति के हैं। मुद्रा योजना के तहत 14.72 लाख करोड़ रुपये के 35 करोड़ से अधिक लोन महिलाओं को दिए गए, जिससे वे नौकरी मांगने वाली नहीं, बल्कि नौकरी देने वाली बनीं।

आज देश की 10 करोड़ महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं, जिन्हें 11 लाख करोड़ की वित्तीय मदद दी जा रही है। 35 करोड़ से अधिक मुद्रा लोन और 'लखपति दीदी' बनाने का संकल्प यह दर्शाता है कि मोदी राज में नारी अब सिर्फ घर नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था चला रही है। 

'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' का ही परिणाम है कि आज भारत में पहली बार प्रति 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएं हैं। सुकन्या समृद्धि योजना के तहत 4.53 करोड़ से अधिक बेटियों का भविष्य सुरक्षित किया गया है। आज भारत में 43% STEM (विज्ञान और तकनीक) ग्रेजुएट्स महिलाएं हैं, जो विकसित देशों से भी अधिक है।

स्टैंड-अप इंडिया जैसी महत्वाकांक्षी योजना के तहत 80% लाभार्थी हमारी बहनें और बेटियां हैं। पीएम मुद्रा योजना के तहत भी लगभग 70% ऋण महिलाओं के लिए स्वीकृत किए गए हैं।

2014 के बाद से, तकनीकी शिक्षा, विशेषकर औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITI) में महिलाओं की भागीदारी लगभग दोगुनी हो गई है। भारत में लगभग 43% STEM स्नातक महिलाएं हैं। भारत में लगभग एक चौथाई अंतरिक्ष वैज्ञानिक महिलाएं हैं, जिनका समर्पण और मेहनत चंद्रयान, गगनयान और मंगल मिशन जैसे देश के प्रमुख अंतरिक्ष मिशनों में महत्वपूर्ण रहा है।

आज भारत में पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाएं उच्च शिक्षा में दाखिला ले रही हैं। हमारे पास नागरिक उड्डयन में सबसे अधिक संख्या में महिला पायलट हैं। वहीं भारतीय वायुसेना में महिला पायलट अब लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं।  

हमारी सरकार ने सवेतन मातृत्व अवकाश (Paid Maternity Leave) को 12 सप्ताह से बढ़ाकर सीधा 26 सप्ताह किया है।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने वह ऐतिहासिक पल देखा, जब श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी के रूप में देश को अपनी पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति मिलीं।

चाहे आरबीआई (RBI) की पहली महिला सीएफओ सुधा बालकृष्णन हों या अर्धसैनिक बल का नेतृत्व करने वाली पहली महिला अर्चना रामासुंदरम, मोदी सरकार ने योग्यता को सम्मान देते हुए हर महत्वपूर्ण संस्थान की चाबी महिलाओं को सौंपी है। 


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