सत्ता का अहंकार बनाम सेवा का संकल्प: जब प्यासी जनता के लिए 'मसीहा' बने भीम जायसवाल
जिला ब्यूरो मुनेन्द्र यादव
अनूपपुर। भीषण गर्मी और गिरते जलस्तर के बीच जहाँ एक तरफ नगर परिषद की संवेदनहीनता चरम पर है, वहीं दूसरी ओर मानवता की एक अनूठी मिसाल देखने को मिली है। एक तरफ सत्ता के मद में चूर अध्यक्ष की बेरुखी है, तो दूसरी ओर बिना किसी सरकारी पद के जनता का दर्द समझने वाला एक सेवाभावी व्यक्तित्व।
कुर्सी के गुमान में 'अंधे' हुए अध्यक्ष!
नगर परिषद के अध्यक्ष यशवंत सिंह इन दिनों अपनी कार्यशैली को लेकर जनता के निशाने पर हैं। आरोप है कि पद के अहंकार में डूबे अध्यक्ष को शहर में मची पानी की त्राहि-त्राहि सुनाई नहीं दे रही है। वार्डों में लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं, लेकिन अध्यक्ष महोदय की प्राथमिकता सूची में जनसेवा शायद सबसे नीचे है। उनकी इस चुप्पी और निष्क्रियता ने लोगों के गुस्से को और भड़का दिया है।
परिषद की 'मानवता' शर्मसार: प्यास के बीच पानी का व्यापार!
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जहाँ परिषद को आपदा के समय राहत पहुंचानी चाहिए, वहाँ 'मानवता मारकर' पानी बेचने का खेल चल रहा है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि सरकारी तंत्र इस हाहाकार के बीच भी मुनाफाखोरी में व्यस्त है। जनता का हक उन्हें मुफ्त देने के बजाय, परिषद के संसाधनों का इस्तेमाल व्यापारिक लाभ के लिए किया जा रहा है।
भीम जायसवाल: बिना पद के निभाया 'जनप्रतिनिधि' का धर्म
इस घोर अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के बीच भीम जायसवाल एक उम्मीद की किरण बनकर उभरे हैं। उनके पास न तो कोई सरकारी पद है और न ही परिषद का बजट, लेकिन उनके पास लोगों का दर्द समझने वाला दिल है।
निजी पहल: जनता की प्यास को देखते हुए भीम जायसवाल ने अपने निजी खर्च पर प्राइवेट टैंकरों का इंतजाम किया।
घर-घर दस्तक: बिना किसी शोर-शराबे के, उनके टैंकर उन बस्तियों तक पहुँच रहे हैं जहाँ परिषद के टैंकरों ने जाना छोड़ दिया है।
करारा जवाब: भीम की इस पहल ने उन लोगों को आईना दिखाया है जो पद पर रहकर भी अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं।
"जनता ने जिन्हें चुना, वे प्यास का तमाशा देख रहे हैं। ऐसे में भीम जायसवाल जैसे लोग साबित करते हैं कि सेवा करने के लिए किसी 'लाल बत्ती' या 'कुर्सी' की ज़रूरत नहीं होती, बस नियत साफ होनी चाहिए।"
एक स्थानीय नागरिक का बयान
बड़ा सवाल: आखिर कब जागेगा प्रशासन?
यशवंत सिंह की 'पद की गर्मी' और भीम जायसवाल की 'सेवा की ठंडक' के बीच अब शहर की जनता यह सवाल पूछ रही है कि
क्या टैक्स भरने वाली जनता को पानी के लिए हमेशा दानदाताओं के भरोसे ही रहना होगा? और क्या भ्रष्टाचार में डूबी परिषद पर कोई लगाम कसेगा?

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